प्रसन्नता का विषय है कि नई पीढ़ी के युवा अपने पारंपरिक वाद्य यंत्र जैसे ढोल-दमाऊ, तुरही, भंकोरा आदि के साथ अपनी विशिष्ट पहचान को जीवंत कर रहे हैं।
केवल होली के गीत ही नहीं बल्कि इनके गीतों में गढ़वाली संस्कृति, गांव-घर की यादें, प्रकृति, प्रेम, पलायन की पीड़ा और सामाजिक संदेश होते हैं।
बचपन में गाँव में सुने गीतों को पुनः मौलिक रूप में सुनना भावुक कर देता है।
वीरान होते गांवों की पीढ़ा व्यक्त करता गीत “पुराणी ड्येली गया तुमरी तख ताला लग्यांन…” बहुत मार्मिक संदेश देता है।











